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तिरुक्कुरळ् - संस्कृतानुवाद्
THIRUVALLUVAR'S THIRUKKURAL IN SANSKRIT SLOKAS
BY S.N. Srirama Desikan, Siromani
WITH AN INTRODUCTION BY Dr. C.P. Ramaswamy Aiyar |
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विषय-सूची |
भाग–१: धर्मकाण्ड:
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भाग–२: अर्थ-काण्ड:
| अध्याय 039 to 050 | |
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39. राजमहिमा |
45. महत्साह्यं |
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40. विद्या |
46. दु:साङ्गत्यवर्जनम् |
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41. विद्यविहीन: |
47. विमृश्यकारिता |
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42. श्रवणम् |
48. बलपरिज्ञानम् |
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43. ज्ञानसम्पत्ति: |
49. कालपरिज्ञानम् |
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44. दोषषट्कनिराकरणम् |
50. स्थलपरिज्ञानम् |
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अध्याय
051 to
060
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51. विभृश्यविश्वसनम् |
56. अनीत्यापालनम् |
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52. विमृश्य कार्यकरणम |
57. निर्भयत्वन् |
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53. बन्धुप्रीति |
58. दाक्षिण्यम् |
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54. अविस्मरणम् |
59. चारप्रेषणम् |
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55. नीतिपरिपालनम् |
60. उत्साहसम्पत्ति: |
| अध्याय 061 to 070 |
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61. आलस्याभाव |
66. क्रियाशुद्धि |
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62. प्रयत्नशीलत्वम् |
67. क्रियादाढर्यम् |
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63. औत्सुक्यम् |
68. कार्याचरणप्रकार: |
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64. अमात्य: |
69. दौत्यम् |
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65. वाग्मित्वम् |
70. राजसेवा |
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अध्याय
071 to
080 |
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| 71. इङ्गितपरिज्ञानम् | 76. अर्थार्जनोपाय: |
| 72. सभास्वरूपम् | 77. सैन्यप्रयोजनम् |
| 73. सभाकम्पविहीनता | 78. सेनादार्ढ्यम् |
| 74. देश्: | 79. स्नेह: |
| 75. दुर्ग: | 80. स्नेह्अपरीक्षा |
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अध्याय
081 to 090 |
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| 81. प्राक्तनस्नेह: | 86. भेदबुद्ध: |
| 82. निर्गुणजनमैत्री | 87. शत्रुनिर्णय: |
| 83. आन्तरस्नेहशून्यता | 88. विरोवतत्त्वपरिज्ञानम् |
| 84. मौढ्यम् | 89. आन्तरवैरम् |
| 85. अल्पज्ञत्वम् | 90. महात्मनिन्दानिराकरणम् |
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अध्याय
91 to 100 |
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| 91. भार्यानुवर्तनम् | 96. कुलीनत्वम् |
| 92. पण्याङ्गना | 97. मानम् |
| 93. मद्यपाननिषेध: | 98. महत्त्वम् |
| 94. द्यूत: | 99. विशिष्टगुणसम्पत्ति: |
| 95. औषधम् | 100. अनुसृत्य प्रवर्तनम् |
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अध्याय
101 to 108 |
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| 101. निरर्थकं वित्तम् | 105. दारिद्र्यम् |
| 102. लज्जाशीलता | 106. याचना |
| 103. कुलगौरवरक्षणम् | 107. याचनाभीति: |
| 104. कृषिकर्म | 108. नीचत्वम् |
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भाग–३: काम-काण्ड:
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अध्याय
109 to
120 |
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| 109. दर्शनंवितर्कश्च तिरुक्कुरळ् | 115. अपवादकथनम् |
| 110. भावपरिज्ञानम् | 116. वियोगसहनम् |
| 111. सम्भोगसुखम् | 117. वियोगदु:खानुभव: |
| 112. लावण्यमहिमा | 118. नायकदिदृक्षामृलकखेद: |
| 113. प्रेमप्रभावकथनम् | 119. वैवर्ण्यमूलकव्यसनम् |
| 114. निर्लज्जात्वकथनम् | 120. वियोगव्यसनाधिक्यम् |
| अध्याय 121 to 133 | |
| 121. अनुभृतसुखं स्मृत्वा रोदनम् | 128. अभिज्ञाननिवेदनम् |
| 122. दृष्टस्वप्नकथनम् | 129. संभोगत्वरा |
| 123. सायङ्कालदर्शनेन खेद: | 130. मनसि निर्वेद: |
| 124. अवयवसौन्दर्यहानि: | 131. विप्रलम्भ: |
| 125. मनस्येव कथनम् | 132. विप्रलम्भरहस्यम् |
| 126. धैर्यहानि: | 133. विप्रलम्भसुखम् |
| 127. कामुकयोरन्योन्यव्यसनम् |
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